प्राचीन भारत का इतिहास है महाभारत।

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 श्रीकृष्ण द्वैपायन नाम के वेदव्यास ने यह ग्रंथ श्रीगणेशजी की मदद से लिखा था। जीवन के रहस्यों से भरे इस ग्रंथ को 'पंचम वेदकहा गया है। यह ग्रंथ हमारे देश के मन-प्राण में बसा हुआ है। यह भारत की राष्ट्रीय गाथा है। इस ग्रंथ में तत्कालीन भारत का समग्र इतिहास वर्णित है। यह ग्रंथ अपने आदर्श स्त्री-पुरुषों के चरित्रों से हमारे देश के जन-जीवन को यह प्रभावित करता रहा है। इसमें सैकड़ों पात्रोंस्थानोंघटनाओं तथा विचित्रताओं  विडंबनाओं का वर्णन है। प्रत्येक हिंदू के घर में महाभारत होना चाहिए।


                                          तीन चरणों में लिखी  

 वेदव्यास की महाभारत को बेशक मौलिक माना जाता हैलेकिन वह तीन चरणों में लिखी गई। पहले चरण में 8,800 श्लोकदूसरे चरण में 24 हजार और तीसरे चरण में एक लाख श्लोक लिखे गए। वेदव्यास की महाभारत के अलावा भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूटपुणे की संस्कृत महाभारत सबसे प्रामाणिक मानी जाती है। अंग्रेजी में संपूर्ण महाभारत दो बार अनूदित की गई थी। पहला अनुवाद 1883-1896 के बीच किसारी मोहन गांगुली ने किया था और दूसरा मनमंथनाथ दत्त ने 1895 से 1905 के बीच। 100 साल बाद डॉदेबरॉय तीसरी बार संपूर्ण महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं।

                                     28वें वेदव्यास ने लिखी महाभारत

ज्यादातर लोग यह जानते हैं कि महाभारत को वेदव्यास ने लिखा है लेकिन यह अधूरा सच है। वेदव्यास कोई नाम नहींबल्कि एक उपाधि थीजो वेदों का ज्ञान रखने वाले लोगों को दी जाती थी। कृष्णद्वैपायन से पहले 27 वेदव्यास हो चुके थेजबकि वे खुद 28वें वेदव्यास थे। उनका नाम कृष्णद्वैपायन इसलिए रखा गयाक्योंकि उनका रंग सांवला (कृष्णथा और वे एक द्वीप पर जन्मे थे।

महाभारत में कई घटनासंबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत हैचाहे वह कौरवपांडवकर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्नशल्यशिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शापवचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं। आओ जानते हैं कि ऐसे कौन कौन से रहस्य महाभारत में छुपे हुए हैं। महाभारत युद्ध और उससे जुड़े 18 रहस्यों का एक अद्भुत आलेख... दावा है कि आप निश्चित ही चौंक जाएंगे। साथ ही इस 18 पेज को पढ़ने के बाद आप महाभारत के संबंध में सब कुछ जान जाएंगे।

                                महाभारत के योद्धा किसके पुत्र या अवतार थे?

 महाबली बलराम शेषनाग के अंश थे। आठ वसुओं में से एक 'द्युनामक वसु ने ही भीष्म के रूप में जन्म लिया था। देवगुरु बृहस्पति ने ही द्रोणाचार्य के रूप में जन्म लिया था। गुरु द्रोणाचार्य के अश्‍वत्थामा को महादेवयमकाल और क्रोध के सम्मिलित अंश से उत्पन्न किया गया था। देवताओं में सबसे प्रमुख सूर्यदेव के पुत्र कर्ण थे। कर्ण सूर्य के अंशावतार थे। दुर्योधन कलियुग का तथा उसके 100 भाई पुलस्त्य वंश के राक्षस के अंश थे।
अर्जुन के धर्मपिता पांडु थेलेकिन असल में वे इन्द्र-कुंती के पुत्र थे। भीम को पवनपुत्र कहा जाता है। हनुमानजी भी पवनपुत्र ही थे। युधिष्ठिर धर्मराज-कुंती के पुत्र थे। युधिष्ठिर के धर्मपिता पांडु थे और वे 5 पांडवों में से सबसे बड़े भाई थे। नकुल और सहदेव 33 देवताओं में से 2 अश्विनीकुमारों के अंश से उत्पन्न हुए थे। ये दो अश्‍विनी कुमार थे- 1. नासत्य और 2. दस्त्र।

रुद्र के एक गण ने कृपाचार्य के रूप में अवतार लिया। द्वापर युग के अंश से शकुनि का जन्म हुआ। अरिष्टा के पुत्र हंस नामक गंधर्व धृतराष्ट्र तथा उसका छोटा भाई पाण्डु के रूप में जन्मे। सूर्य के अंश धर्म ही विदुर के नाम से प्रसिद्ध हुए। कुंती और माद्री के रूप में सिद्धि और धृतिका का जन्म हुआ था। मति का जन्म राजा सुबल की पुत्री गांधारी के रूप में हुआ था। राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणी के रूप में लक्ष्मीजी  द्रौपदी के रूप में इंद्राणी उत्पन्न हुई थीं। अभिमन्यु चंद्रमा के पुत्र वर्चा का अंश था।

मरुतगण के अंश से सात्यकिद्रुपदकृतवर्मा  विराट का जन्म हुआ था। अग्नि के अंश से धृष्टधुम्न  राक्षस के अंश से शिखंडी का जन्म हुआ था। विश्वदेवगण द्रौपदी के पांचों पुत्र प्रतिविन्ध्यसुतसोमश्रुतकीर्तिशतानीक और श्रुतसेव के रूप में पैदा हुए थे।  दानवराज विप्रचित्ति जरासंध  हिरण्यकशिपु शिशुपाल का अंश था। कालनेमि दैत्य ने ही कंस का रूप धारण किया था।  इंद्र की आज्ञानुसार अप्सराओं के अंश से 16 हजार स्त्रियां उत्पन्न हुई थीं।  


                                                    18 का रहस्य 

 कहते हैं कि महाभारत युद्ध में 18 संख्‍या का बहुत महत्व है। महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। 18 दिन तक ही युद्ध चला। गीता में भी 18 अध्याय हैं। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे। सवाल यह उठता है कि सब कुछ 18 की संख्‍या में ही क्यों होता गयाक्या यह संयोग है या इसमें कोई रहस्य छिपा है?

                                                    कुल 18 अध्याय हैं- 

अर्जुनविषादयोगसांख्ययोगकर्मयोगज्ञानकर्मसंन्यासयोगकर्मसंन्यासयोगआत्मसंयमयोगज्ञानविज्ञानयोगअक्षरब्रह्मयोगराजविद्याराजगुह्ययोगविभूतियोगविश्वरूपदर्शनयोगभक्तियोग,  क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगगुणत्रयविभागयोगपुरुषोत्तमयोगदैवासुरसम्पद्विभागयोगश्रद्धात्रयविभागयोग और मोक्षसंन्यासयोग।  

महाभारत ग्रंथ में कुल 18 पर्व हैंआदि पर्वसभा पर्ववन पर्वविराट पर्वउद्योग पर्वभीष्म पर्वद्रोण पर्वअश्वमेधिक पर्वमहाप्रस्थानिक पर्वसौप्तिक पर्वस्त्री पर्वशांति पर्वअनुशासन पर्वमौसल पर्वकर्ण पर्वशल्य पर्वस्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व।  मालूम हो क‍ि ऋषि वेदव्यास ने 18 पुराण भी रचे हैं। 
  
                                                कौरवों का जन्म एक रहस्य : 

कौरवों को कौन नहीं जानता। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थीतब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए। युयुत्सु एन वक्त पर कौरवों की सेना को छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल हो गया था।

गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर किया। गर्भ धारण कर लेने के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गएकिंतु गांधारी के कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया। वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- 'गांधारीतूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घीभरवा दो।'

वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गए। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।

                                     महाभारत काल में विमान और परमाणु अस्त्र थे? :

 मोहन जोदड़ो में कुछ ऐसे कंकाल मिले थे जिसमें रेडिएशन का असर था। महाभारत में सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गए हैं। हिंदू इतिहास के जानकारों के मुताबिक 3 नवंबर 5561 ईसापूर्व छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र परमाणु बम ही था?

                                             महाभारत में इसका वर्णन मिलता है- 

''तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम।।'' ''सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम। चचाल  मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा।।'' 8 ।। 10 ।।14।।

अर्थात ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने के बाद भयंकर वायु जोरदार तमाचे मारने लगी। सहस्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे। भूतमातरा को भयंकर महाभय उत्पन्न हो गया। आकाश में बड़ा शब्द हुआ। आकाश जलाने लगा पर्वतअरण्यवृक्षों के साथ पृथ्वी हिल गई।

अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच ही हमारी आज की टेक्नोलॉजी से कहीं ज्यादा उन्नत थी महाभारतकालीन टेक्नोलॉजी?

                                       महान योद्धा बर्बरीक और घटोत्कच : 

भीम के पुत्र घटोत्कच और पौत्र बर्बरिक के बारे में कहा जाता है कि इन दोनों की सामान्य मानवों से कई गुना ज्यादा ऊंचाई थी। माना जाता है कि कद-काठी के हिसाब से भीम पुत्र घटोत्कच इतना विशालकाय था कि वह लात मारकर रथ को कई फुट पीछे फेंक देता था और सैनिकों तो वह अपने पैरों तले कुचल देता था। भीम की असुर पत्नी हिडिम्बा से घटोत्कच का जन्म हुआ था।जन्म लेते समय उसके सिर पर केश (उत्कचनहीं थे इसलिए उसका नाम घट-हाथी का मस्तक + उत्कचकेशहीन अर्थात घटोत्कच रखा गया। इसका मस्तक हाथी के मस्तक जैसा और केशशून्य होने के कारण यह घटोत्कच नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह अत्यंत मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया। उसमें जहां शारीरिक बल था वहीं वह मायावी भी था। चूंकि घटोत्कच की माता एक राक्षसी थीपिता एक वीर क्षत्रिय था इसलिए इसमें मनुष्य और राक्षस दोनों के मिश्रित गुण विद्यमान थे। वह बड़ा क्रूर और निर्दयी था।

घटोत्कच ने युद्ध में अपने विशाल शरीर से हाहाकार मचा रखा था। वे एक ही बार में अपनी पैरों के नीचे कई सैनिकों को कुचल कर मार देते थे जिससे घबराकर दुर्योधन ने कर्ण को अमोघ अस्त्र चलाने का आदेश दिया। इस अस्त्र से घटोत्कच वीरगति को प्राप्त हुए। दूसरी ओर बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। 

युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे। बर्बरीक ने कहामांगो ब्राह्मणक्या चाहिएब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा कि तुम दे  सकोगे। लेकिन बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए और कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया।

बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया। बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है।

                                          श्रीकृष्ण का जीवन एक रहस्य :

 महाभारत की प्रत्येक घटना को श्रीकृष्ण ही संचालित करते हुए नजर आते हैं। दुर्योधन को माता के समक्ष नग्न जाने से रोकनाकर्ण को कवच कुंडलों को इंद्र द्वारा दान में मांग लेनाबर्बरिक से दान में उसका शीम मांग लेना और युक्ति पूर्वक कर्णद्रोण और भीष्म को युद्ध में मारवा देना यह सभी श्रीकृष्ण की नीति से ही संभव होता है। श्रीकृष्ण के कारण ही यह युद्ध हुआ और उन्हीं ने इस युद्ध को पांडवों के पक्ष में वीजित किया।

                                         श्रीकृष्ण और आठ का अंक :
  
भविष्यवाणी के अनुसार विष्णु को देवकी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लेना थातो उन्होंने अपने 8वें अवतार के रूप में 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के 7 मुहूर्त निकल गए और 8वां उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5126 वर्ष पूर्वको हुआ हुआ। ज्योतिषियों के अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था। श्रीकृष्ण के आठ पन्नियां थीं। उनके जीवन में आठ नगरों का महत्व ज्यादा रहा। मथुरागोकुलगोवर्धनवृंदावनअवंतिकाहस्तिनापुरद्वारिका और प्रभाष क्षेत्र।

                                       विचित्र शक्तियों से संपन्न योद्ध : 

महाभारत में एक से एक बढ़कर योद्धा थे जो शक्तिशाली होने के साथ ही विचित्र किस्म की सिद्धियों और चमत्कारों से भी संपन्न थे। श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान विष्णु थेलेकिन उनके समक्ष और सामने जो योद्धा लड़ रहे थे वे भी कम नहीं थे। 

*सहदेव भविष्य में होने वाली हर घटना को पहले से ही जान लेते थे। वे जानते थे कि महाभारत होने वाली है और कौन किसको मारेगा और कौन विजयी होगा। लेकिन भगवान कृष्ण ने उसे शाप दिया था कि अगर वह इस बारे में लोगों को बताएगा तो उसकी मृत्य हो जाएगी।
*बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। लेकिन श्रीकृष्ण से उसे भी ठीकाने लगा दिया
*महाभारत युद्ध में संजय वेदादि विद्याओं का अध्ययन करके वे धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित मंत्री बन गए थे। आज के दृष्टिकोण से वे टेलीपैथिक विद्या में पारंगत थे। कहते हैं कि गीता का उपदेश दो लोगों ने सुनाएक अर्जुन और दूसरा संजय।
 
*गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा हर विद्या में पारंगत थे। वे चाहते तो पहले दिन ही युद्ध का अंत कर सकते थेलेकिन कृष्ण ने ऐसा कभी होने नहीं दिया। कृष्‍ण यह जानते थे कि पिता-पुत्र की जोड़ी मिलकर ही युद्ध को समाप्त कर सकती है।
 
*कर्ण से यदि कवच-कुंडल नहीं हथियाए होतेयदि कर्ण इन्द्र द्वारा दिए गए अपने अमोघ अस्त्र का प्रयोग घटोत्कच पर  करते हुए अर्जुन पर करता तो आज भारत का इतिहास और धर्म कुछ और होता।
*कुंती-वायु के पुत्र थे भीम अर्थात पवनपुत्र भीम। भीम में हजार हाथियों का बल था। युद्ध में भीम से ज्यादा शक्तिशाली उनका पुत्र घटोत्कच ही था। घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक था।
 
*माना जाता है कि कद-काठी के हिसाब से भीम पुत्र घटोत्कच इतना विशालकाय था कि वह लात मारकर रथ को कई फुट पीछे फेंक देता था और सैनिकों तो वह अपने पैरों तले कुचल देता था। भीम की असुर पत्नी हिडिम्बा से घटोत्कच का जन्म हुआ था।
 
*शांतनु-गंगा के पुत्र भीष्म का नाम देवव्रत था। उनको इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था।
 
*दुर्योधन का शरीर वज्र के समान कठोर थाजिसे किसी धनुष या अन्य किसी हथियार से छेदा नहीं जा सकता था। लेकिन उसकी जांघ श्रीकृष्ण के छल के कारण प्राकृतिक ही रह गई थी। इस कारण भीम ने उसकी जांघ पर वार करके उसके शरीर के दो फाड़ कर दिए थे।
 
*जरासंघ का शरीर दो फाड़ करने के बाद पुनजुड़ जाता था। तब श्रीकृष्ण ने भीम को इशारों में समझाया की दो फाड़ करने के बाद दोनों फाड़ को एक दूसरे की विपरित दिशा में फेंक दिया जाए। 
                           महाभारत में  तो कौरवों ने युद्ध लड़ा और  पांडवों ने 
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि महाभारत में  तो कौरवों ने युद्ध लड़ा और  ही पांडवों ने। कौरव उसे कहते हैं जो कुरुवंश का हो। कुरुवंश के दो योद्धा भीष्म। उसी तरह जब पांडु का कोई पुत्र था ही नहीं तो कैसे पांचों कुंती पुत्र को पांडव कहेंग

                                            कौन थे 100 कौरव 

कौरव महाभारत में हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र और गांधारी के पुत्र थे। ये संख्या में 100 थे तथा कुरू के वंशज थे। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या सभी कौरव और पांडव कुरू के वंशज थेयदि नहीं थे तो फिर वे किसके वंशज थे। दूसरा सवाल यदि धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव नहीं थे तो फिर कौरव कौन थे?

पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी से अत्रिअत्रि से चन्द्रमाचन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयुआयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरू हुए। पुरू के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरू हुए। कुरू के वंश में शांतनु का जन्म हुआ। कुरू से वंशजों को कौरव कहा जाता है।

महाराजा शांतनु की पत्नी का नाम था गंगा। गंगा से उन्हें 8 पुत्र मिले जिसमें से 7 को गंगा में बहा दिया गया और 8वें पुत्र को पाला-पोसा। उनके 8वें पुत्र का नाम देवव्रत था। यह देवव्रत ही आगे चलकर भीष्म कहलाया। यह कुरूवंश की एक शाखा का अंतिम राजा था। बाद में राजा शांतनु का निषाद जाति की एक महिला सत्यवती से प्रेम हो गया। सत्यवती के कारण देवव्रत को आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा लेना पड़ी।

शांतनु को सत्यवती से दो पुत्र मिले चित्रांगद और विचित्रवीर्य। चित्रांगद युद्ध में मारा गया जबकि विचित्रवीर्य का विवाह भीष्म ने काशीराज की पुत्री अंबिका और अंबालिका से कर दिया। लेकिन विचित्रवीर्य को कोई संतान नहीं हो रही थी तब चिंतित सत्यवती ने कुंवारी अवस्था में
 पराशर मुनि से उत्पन्न अपने पुत्र वेद व्यास को बुलाया और उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी कि 
अंबिका और अंबालिका को कोई पुत्र मिले। अंबिका से धृतराष्ट्र और अंबालिका से पांडु का जन्म हुआ जबकि एक दासी से विदुर का। इस तरह देखा जाए तो पराशर मुनि का वंश चला।

वेद व्यासजी ने महाभारत को लिखा था। वेद व्यास कौन थेवेद व्यास सत्यवती के पुत्र थे और उनके पिता ऋषि पराशर थे। सत्यवती जब कुंवारी थीतब वेद व्यास ने उनके गर्भ से जन्म लिया था। बाद में सत्यवती ने हस्तिनापुर महाराजा शांतनु से विवाह किया था। वेद व्यास का असली नाम कृष्ण द्वैपायन था।

पांडु की पत्नी कुंती के पुत्र युधिष्ठिर के जन्म का समाचार मिलने के बाद धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी के मन में भी पुत्रवती होने की इच्छा जाग्रत हुईलेकिन धृतराष्ट्र के लाख प्रयासों के बावजूद कोई पुत्र जन्म नहीं ले पा रहा था तब एक बार फिर से वेद व्यास को बुलाया गया और वेद व्यास की कृपा से गांधारी ने गर्भ धारण किया।

गर्भ धारण के पश्चात 2 वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी जब पुत्र का जन्म नहीं हुआ तो क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट में मुक्का मारकर अपना गर्भ गिरा दिया। योगबल से वेद व्यास को इस घटना को तत्काल जान लिया और उन्होंने गांधारी के पास आकर अपने क्रोध को प्रकट किया। फिर उन्होंने कहा कि तुरंत ही 100 कुंड तैयार कर उसमें घृत भरवा दो।

गांधारी ने उनकी आज्ञानुसार 100 कुंड बनवा दिए तब वेद व्यास ने गांधारी के गर्भ 
से निकले मांसपिंड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिसके चलते उस पिंड के अंगूठे के 
पोर बराबर 100 टुकड़े हो गए। वेद व्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए 100 कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों
 को 2 वर्ष पश्चात खोलने का आदेश दे अपने आश्रम चले गए। 2 वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। दुर्योधन के जन्म के दिन ही कुंती के पुत्र भीम का भी जन्म हुआ। दुर्योधन जन्म लेते ही गधे की तरह रेंकने लगा।

ज्योतिषियों से इसका लक्षण पूछे जाने पर उन लोगों ने धृतराष्ट्र को बताया, 'राजन्आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा।फिर उन कुंडों से क्रमशशेष 99 पुत्र एवं दुश्शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ। गांधारी गर्भ के समय धृतराष्ट्र की सेवा में असमर्थ हो गई थी अतएव उनकी सेवा के लिए एक दासी रखी गई। धृतराष्ट्र के सहवास से उस दासी का भी युयुत्सु नामक एक पुत्र हुआ। युवा होने पर सभी राजकुमारों का विवाह यथायोग्य कन्याओं से कर दिया गया। दुश्शला का विवाह जयद्रथ के साथ हुआ।

                                                  पांडव नहीं थे पांडु पुत्र 

 एक बार राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुंती तथा माद्री के साथ वन में आखेट के लिए निकले। वहां उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दिखाई दिया। पांडु ने तत्काल उस मृग को एक बाण मार दिया। मरते हुए मृग ने पांडु को शाप दिया, 'राजनतुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी भी मृत्यु हो जाएगी।'

इस शाप से पांडु अत्यंत दुःखी हुए और अपनी रानियों से बोले, 'अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग करके इस वन में ही रहूंगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ।दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, 'हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रहने दीजिए।पांडु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

एक दिन पांडु अपनी पत्नी से बोले, 'हे कुंतीमेरा जन्म लेना ही व्यर्थ हो रहा हैक्योंकि संतानहीन व्यक्ति पितृ-ऋणऋषि-ऋणदेव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिए मेरी सहायता कर सकती हो?' 

कुंती बोली, 'हे आर्यदुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मंत्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूं। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊं?' 

इस पर पांडु ने धर्म को आमंत्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुंती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालांतर में पांडु ने कुंती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमंत्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। बाद में कुंती ने माद्री को उक्त मंत्र की दीक्षा दे दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमंत्रित किया किया और इस तरह नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पांडु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पांडु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन में प्रवृत्त हुए ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। बाद में माद्री उनके साथ सती हो गई। ऐसे में सभी पुत्रों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी कुंती पर  गई और इस तरह कुंती ने हस्तिनापुर लौटकर अपने पुत्रों के हक की लड़ाई लड़ी।

इस तरह पांडवों की मां दो थी और छह पिता थे। कुंती के चार पुत्र कर्णयुधिष्ठिरअर्जुन और भीम थे जबकि माद्री के पुत्र नकुल और सहदेव थे।
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